Sunday, February 8, 2009

मौसम का ख़त .......





आज फिर नही आया ख़त तुम्हारा
जो पिछले मौसम से उधार है तुम पर

मौसम के हर एक सूरज का
एक ख़त भेजा था तुमको
और लिखा था
उस 'इमली के पौधे' के बारे में
जो आँगन में लगा गए थे तुम

सूख सा गया है आजकल कुछ
वो भी तुम्हारे ज़वाब की ताक में है, शायद

बरसात का पानी आज भी
बिस्तर तक आ जाता है
खिड़कियों को चीर कर
और नम हो जाता है तुम्हारा हिस्सा

कभी नमी महसूस हो तुम्हे भी तो
भेजना एक ख़त मेरे नाम

कुछ ना भी लिखो अगर तुम ख़त में
महज़ एक कोरा कागज़ भी काफी होगा.......

... अक्स

Saturday, January 31, 2009

वक्त की रफ़्तार ...

देखा है उम्मीदों को घुटनों के बल चलते हुए
देखा है हकीकत को ख्वाब में बदलते हुए,
हर मौत, ज़िन्दगी का रूप इख्तियार कर रही है
लगता है वक्त की रफ़्तार कुछ बढ़ गई है;

उस मोड़ पर वो 'इमली का पेड़' सूख सा गया है
और चाय कि दुकान भी जाने खो गयी है कहीं
तारीख तो वही है पर हाँ सालों गुज़र गए
क्या वाकई वक्त की रफ़्तार कुछ बढ़ गई है ?

-अक्स

Wednesday, January 28, 2009

लकीर

देखा था कल एक लकीर को अपने हाथों में बनते हुए,
गुम हो गई है आज कहीं वो पुरानियों के बीच.......

Saturday, January 10, 2009

पुनर्जन्म ...

यूँ तो ये तारीख हर साल ही आती थी ,
और रख दी जाती थी संदूक में
एक बिन ज़वाब के ख़त की तरह ,

पर क्यों आज लगता है ये दिन
पहली बार आया है मेरी ज़िन्दगी में

फिर से जन्मा हूँ मैं आज शायद ,
'पुनर्जन्म' हुआ है मेरा .......

...अक्स

Tuesday, December 30, 2008

दिल, चेहरा और मैं...

रख लिया था दिल अपना छुपाकर कहीं तुमने,
और मैंने लगा लिया था अपना अपने चेहरे पर,
नासमझ था मैं भी ,
भला रखता है कोई अपना दिल अपने चेहरे पर.......?