Monday, November 22, 2010

पुनर्जन्म...

यूँ तो ये तारीख हर साल ही आती थी ,
और रख दी जाती थी संदूक में
एक बिन ज़वाब के ख़त की तरह ,

वक़्त से उधर लिया हर एक लम्हा
क़र्ज़ बन जाता था और
दीवार पे टंगे हुए दिन पलट जाया करते थे
जैसे हवा में पलट जाते हैं किसी किताब के पन्ने

बरसातें सूखी रह जाती थीं
जैसे बिन स्याही के मेरी कलम

पर क्यों आज लगता है ये दिन
पहली बार आया है मेरी ज़िन्दगी में

फिर से जन्मा हूँ मैं आज शायद ,
'पुनर्जन्म' हुआ है मेरा .......

...अक्स

Monday, February 15, 2010

ढूंढ लो अब कोई और ठिकाना...

कब से यूँ ही मुझमे घर कर रखा है तुमने ?
कभी पूछा तक नहीं !
मैं खुद ही किरायेदार हूँ ज़िन्दगी का
मेरा
ठिकाना नहीं है कोई,

मेरे पास कुछ नहीं है जो मैं तुम्हे दे सकूंगा
बस प्रेम कर सकता था
जो किया मैंने तुमसे
पर अब सच्चाई की धरती पर आने के बाद
ख्वाब के आसमान खोखले दिखते हैं,

प्रेम से पेट नहीं भरता
भरे पेट से ही प्रेम हो सकता है
मैं नहीं रख सकूंगा तुम्हे भूखा
मैं नहीं देख सकूंगा तुम्हे ढलते हुए,


मैं कमजोर नहीं मजबूर हूँ शायद
नहीं रख सकता मैं तुम्हे और अपने दिल में
ढूंढ लो अब
कोई और ठिकाना,

तुम्हारे बेघर हो जाने से
बेहतर है दूर चले जाना
...

...अक्स

श्रधांजली...

कल जब तुम्हे देखता था तो
कोई ख्याल नहीं आता था मन में
कभी भी किसी पल के साये में
तुमसे कोई सरोकार नहीं था

किसी भी हलचल में तुम्हारी परछाई नहीं देखी थी मैंने
और न ही कभी सुनी थी तुम्हारी हंसी
बस देखा था तुम्हे कभी चहकते हुए
बस नाम ही जानता था मैं तुम्हारा शायद

यूँ तो कुछ खास रिश्ता नहीं था तुमसे लेकिन
तुम्हारे जाने के बाद लगा
कि मौत बस छू कर निकल गयी मुझको.......

...अक्स

Saturday, February 13, 2010

अँधेरा और मैं.......

हर बार लड़ कर हारा हूँ मैं अँधेरे से
यूँ ही नहीं मैंने एक लौ जला रखी है...

-अक्स

Tuesday, March 17, 2009

सोना...

ज़रा असमान की तरफ़ देखो सोना, चाँद का दाग मिट गया है आज,
प्यार ने अपना रंग दिखा दिया है ,

तुम कहती थी न सोना ! कि प्यार एक जंग है,
अगर ये जंग होती तो मैं कब का मर गया होता;

तुम कहती थी न , कि वक्त बदल जाता है ,
वक्त तो नही बदला सोना, पर हाँ इसकी रफ़्तार ज़रूर बदल गई है
और इस रफ़्तार में बह गया है बहुत कुछ-
तुम , मैं ...

पर तुम्हारी कुछ चीज़ें और वो ख़त , बस एक ही ख़त , आज भी मेरे पास है
और तुम्हारे कुछ शब्दों को अपने जीवन में उतार लिया है मैंने
और अपने नाम में शामिल कर लिया है तुम्हारा नाम;

लिख सकता तुम्हे तो ज़रूर लिखता तुम्हारा नाम अपने लहू से सोना
पर लहू तो कब का सूख चुका है मेरे अन्दर से
वो तो तुम्हारी याद है जो अब तक मेरे रगों में दौड़ रही है .......

...अक्स

Sunday, February 8, 2009

मौसम का ख़त .......





आज फिर नही आया ख़त तुम्हारा
जो पिछले मौसम से उधार है तुम पर

मौसम के हर एक सूरज का
एक ख़त भेजा था तुमको
और लिखा था
उस 'इमली के पौधे' के बारे में
जो आँगन में लगा गए थे तुम

सूख सा गया है आजकल कुछ
वो भी तुम्हारे ज़वाब की ताक में है, शायद

बरसात का पानी आज भी
बिस्तर तक आ जाता है
खिड़कियों को चीर कर
और नम हो जाता है तुम्हारा हिस्सा

कभी नमी महसूस हो तुम्हे भी तो
भेजना एक ख़त मेरे नाम

कुछ ना भी लिखो अगर तुम ख़त में
महज़ एक कोरा कागज़ भी काफी होगा.......

... अक्स

Saturday, January 31, 2009

वक्त की रफ़्तार ...

देखा है उम्मीदों को घुटनों के बल चलते हुए
देखा है हकीकत को ख्वाब में बदलते हुए,
हर मौत, ज़िन्दगी का रूप इख्तियार कर रही है
लगता है वक्त की रफ़्तार कुछ बढ़ गई है;

उस मोड़ पर वो 'इमली का पेड़' सूख सा गया है
और चाय कि दुकान भी जाने खो गयी है कहीं
तारीख तो वही है पर हाँ सालों गुज़र गए
क्या वाकई वक्त की रफ़्तार कुछ बढ़ गई है ?

-अक्स